राजा और युग परिवर्तन मनुस्मृति के अनुसार अच्छे शासक की भूमिका
मनुस्मृति में राजा को केवल एक प्रशासक ही नहीं, बल्कि युगों के स्वरूप का निर्धारक भी बताया गया है। यह ग्रंथ स्पष्ट करता है कि राजा का आचरण ही सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग की प्रकृति को निर्धारित करता है। जब राजा आलस्य और निद्रा में होता है तो कलियुग, जब सावधानी से राज्य करता है तो द्वापर, अपने कार्यों में लगा रहता है तो त्रेता, और शास्त्रानुसार कर्मों का संपादन करता है तो सतयुग होता है। इस लेख में, हम मनुस्मृति के इस अद्वितीय सिद्धांत और एक अच्छे शासक की युग बदलने वाली भूमिका को गहराई से समझेंगे।